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बचपन अभियान

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बचपन अभियान

बचपन अभियान

चित्रकूट, सतना का प्रयास

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता यूं तो हर जगह बच्चों के सेहत को लेकर पूरी तरह मुस्तैद हैं लेकिन कुछ लोग दूर-दराज के ऐसे चुनौतीपूर्ण इलाके में जीवन यापन कर रहे हैं कि उन तक पहुंचना बहुत कठिन हो जाता है। जिला सतना अंतर्गत चित्रकूट परियोजना (मझगंवा) आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा एवं भौगौलिक दृष्टि से भी काफी चुनौतीपूर्ण है। कई गांव जंगल क्षेत्र के बीचोबीच या उसके आस-पास हैं यही कारण है कि वहां पहुंचना मुश्किल हो जाता है। यहां के लोगों तक पहुंचना दुश्वारियों से भरा हुआ है। एक तो यहां दुर्गम रास्ते हैं उस पर आवागमन का साधन भी न के बराबर है। इतना ही नहीं कुछ गांवों में बने आंगनबाड़ी केन्‍द्र आज भी ऐसे हैं जहां मोबाईल नेटवर्क नहीं पहुंचता या बहुत कम मिलता है जैसे- ग्राम चुआ, कानपुर, माटिया चुआ, सुआपहाडी आदि।

ऐसे क्षेत्र जहां नेटवर्क नहीं हैं, आवागमन का साधन नहीं है, दुर्गम रास्ते हैं तो जाहिर है वहां शिक्षा का स्‍तर भी और परियोजनाओं की तुलना में कम ही होगा। इस कारण लोग जागरुक भी नहीं हैं। आर्थिक संसाधनों की कमी है लिहाजा लोगों की आय भी कम है। इसका सीधा प्रभाव रहन-सहन और पोषण पर पड़ता है।

अब ऐसी स्थिति में महिलाओं की सेहत अच्छी नहीं रहती और गर्भावस्था के दौरान सेहत और गिर जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि अस्वस्थ मां अस्वस्थ बच्चे को जन्म देती है जिसका वजन भी कम रहता है लिहाजा कुपोषण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में विभाग और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता का काम काफी चुनौतीपूर्ण एवं संवेदनशील हो जाता है। कार्यकर्ताओं को मां की काउंसलिंग के साथ-साथ पोषण प्रबंधन पर काम करना होता है ताकि मां और बच्‍चा दोनों स्वस्थ रहे सकें।

इसके बाद भी चित्रकूट में कुपोषण की समस्‍या अन्‍य परिेयोजनाओं की तुलना में ज्‍यादा है। कुपोषण की समस्या कम करने के लिए नवाचार के रूप में बचपन अभियान चलाया गया।

बचपन अभियान के तहत सर्वप्रथम ऐसे गावों को चिन्हित किया गया जहां कुपोषित बच्‍चों की संख्‍या ज्‍यादा थी और जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़े थे। उसके पश्‍चात् उन गावों एवं केन्‍द्र का रूट चार्ट तैयार किया गया। जिले की टीम तैयार की गयी ताकि क्षेत्र के सभी बच्‍चों की वास्‍तविक स्थिति का पता लगाया जा सके। जिले से बनायी गयी टीम में अन्‍य परियोजना के परियोजना अधिकारी, पर्यवेक्षक, ब्‍लाक कोऑर्डिनेटर, जिले से जिला कार्यक्रम अधिकारी, सहायक संचालक के साथ-साथ जिला समन्‍वयक पोषण अभियान और जिला परियोजना सहायक पोषण अभियान शामिल थे। 

जिले से बनायी गयी टीम को चिन्हित ग्रामों के आंगनबाड़ी में दर्ज सभी SAM /MAM* बच्‍चों का पुनः वजन एवं ऊंचाई के माप द्वारा पोषण की सही स्थिति का पता करना था। इसके तहत केन्‍द्र के पास के बच्‍चों का सत्‍यापन केन्‍द्र में करना था और केन्‍द्र से दूर वाले घरों में घर-घर जाकर बच्‍चों का वजन एवं उंचाई लेकर सत्‍यापन करना था ताकि सत्‍यापन के पश्‍चात चिन्हित SAM /MAM बच्‍चों का उचित उपचार और बेहतर पोषण प्रबंधन किया जा सके। इसके लिये एक फॉरमेट बनाया गया जिसमें बच्‍चे के जन्म के समय बच्‍चे का वजन एवं उंचाई और अन्‍य जानकारी भरी जा सके ।

 इस अभियान के तहत टीम के द्वारा 40 गांवों में दर्ज बच्चों का वजन/ऊंचाई  के माध्यम से कुल 94 MAM और 29 SAM बच्चों का चिन्हाकंन किया गया। 29 SAM बच्चों में से 15 को एनआरसी में भर्ती कराया गया जबकि 14 बच्चों को सैम और 74 MAM बच्चों को पोषण प्रबंधन के माध्यम से ठीक करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के आशा, एएनएम, सीएचओ और मेडिकल ऑफिसर मझगवां की मदद ली गयी। कार्यकर्ता और पर्यवेक्षक के माध्यम से इन बच्चों का रेगुलर फॉलोअप लिया गया। टीम द्वारा लिए गए वजन एवं कार्यकर्ता के मोबाइल एवं पंजी में दर्ज वजन में अंतर मिला। जिसे मौके पर हिदायत देते हुए सुधार करवाया गया। जिला कार्यक्रम अधिकारी ने निजी तौर पर लोगों से मुलाकात करके उन्हें उनके बच्चों की सेहत के बारे में जागरुक किया है।

बचपन अभियान का सकारात्मक प्रभाव आम लोगों पर हुआ। इसका नतीजा यह रहा कि विभाग द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के प्रति लोगों ने रुचि लेना शुरू किया और योजना में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया तथा हर सम्भव सहयोग भी दिया। आम लोगों की रुचि और सहयोग का परिणाम यह हुआ कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने भी अपने कार्य को पहले की तुलना में ज्‍यादा उत्साह और पारदर्शिता के साथ करना शुरू किया। यह अभियान आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के बिना पूर्व सूचना के उनके कार्य परिक्षेत्र में किया गया।

बचपन अभियान का इतना व्यापक असर हुआ है बच्चों की गिरती सेहत में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है और आस-पास के लोगों पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जिला कार्यक्रम अधिकारी ने निजी तौर पर लोगों से मुलाकात करके उन्हें उनके बच्चों की सेहत के बारे में जागरुक किया है।