सामुदायिक सहभागिता से रानीपुर में पोषण की पहल
सामुदायिक सहभागिता से रानीपुर में पोषण की पहल
- समुदाय, स्वैच्छिक संघटनो के सहयोग से पोषण की दस्तक
- गाँव की समस्याओं की पहचान कर उनके निदान का प्रयास
- पुरुष सहभागिता का प्रयास
- गांव में 28 मध्यम कुपोषित बच्चों में से अब केवल 2 बच्चे मध्यम कुपोषित रह
गए हैं,
हीरों के लिए विख्यात पन्ना शहर के नजदीक गांव है रानीपुर । इसी गांव में पन्ना का अधिकांश हीरा मिलता है, मगर गांव में ज्यादातर लोग गरीब हैं। उन्हें पूरे साल की
खाद्य सुरक्षा के लिए निरंतर जूझना पड़ता है। गांव में पानी की कमी के कारण लोगों का जीवन- यापन कठिनाई से भरा हुआ है। वर्तमान में गाँव में 58 यादव, 68 कोंदर आदिवासी, 8 वंशकार, 7 ठाकुर और 2 पंडित समुदाय के परिवार निवासरत हैं। रानीपुर गांव में पानी की कमी एवं आसपास रोजगार न मिल पाना सबसे बड़ी चुनौती रही है वर्ष 2016 में गांव में 31 बच्चे कुपोषित थे, जिसमें 3 गंभीर कुपोषण का शिकार थे, 18 किशोरी बालिकाओं में खून की कमी थी ।
इन्हीं परिस्थितियों में महिलाओं एवं युवा समूह ने मिलकर पानी के प्रबंधन एवं आंगनवाड़ी सेवाओं के लिए सामुदायिक सहयोग का बीड़ा उठाया और एक गाद से भर
चुके तालाब को गहरा किया तथा एक छोटा स्टापडेम भी बनाया, जिससे तालाब में पानी की मात्रा बढ़ी और कुछ कुओं का जलस्तर भी बढ़ा और खेती की जमीनें दो फसली हुईं। साथ ही पूरे गांव में हर घर में किचन गार्डन लगाया एवं समुदाय को आंगनवाड़ी सेवाओं से जुड़ने हेतु प्रेरित किया.
इस तरह से सरकार, समुदाय एवं संस्था के साझा प्रयास से सामाजिक बदलाव आया एवं अब गांव में कुपोषण समाप्ति की ओर है.
महिला नेतृत्व से गांव में आये बदलाव
सामुदायिक निगरानी - गांव स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व में सरकारी योजनाओं एवं संस्थाओं की देखरेख व्यवस्था को मजबूत किया गया ताकि योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन हो सके और योजना से कोई पात्र (व्यक्ति / परिवार) छूट न सके। महिला समूह के द्वारा आंगनवाड़ी केंद्र में जाकर पोषण आहार वितरण करवाने और उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। युवा समूह द्वारा स्कूल एवं राशन दुकान की देखरेख की जा रही है । इसके अलावा राशन दुकान में राशन रखने की जगह पर साफ-
सफाई और राशन की गुणवत्ता की निगरानी की जा रही है । महिला, युवा एवं किशोरी समूह के सदस्यों द्वारा देखरेख के दौरान सामुदायिक निगरानी प्रपत्र के जरिये आंगनवाड़ी केंद्र की नियमितता, स्कूल में बच्चों को मेन्यु के अनुसार भोजन की उपलब्धता, राशन दुकान में अनाज में चावल अधिक दिया जाना जैसे मुद्दे निकल कर आये। समूह के साथियों के द्वारा आंगनबाड़ी, स्कूल, राशन दुकान से प्राप्त जानकारी को समूह के सभी सदस्यों के सामने रखा गया तब निर्णय हुआ कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से बात कर नियमित समय से आंगनवाड़ी खोले जाने, स्कूल में बच्चों के भोजन में गुणवत्ता के संबंध में शिक्षकों से चर्चा करने और मध्यान्ह भोजन में सुधार लाने की बात हुई, सभी से संवाद हुआ।
घर-घर पोषण वाटिका का अभियान
रानीपुर गाँव में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए 80 परिवारों द्वारा पोषण वाटिका लगायी गयी है। पोषण वाटिका लगाने के लिए जगह को उपयुक्त बनाने, गुड़ाई, निदाई
और क्यारियों का निर्माण कर मचान तैयार किए गए हैं। इन पोषण वाटिकाओं में विविध प्रकार की सब्जियां (टमाटर, भिन्डी, बैंगन, लौकी, करेला, कुम्हडा, पपीता,
बरबटी, सेम, मिर्च) लगाई गयी हैं । 80 परिवारों की पोषण वाटिका में 6 माह में 8820 किलोग्राम सब्जियों का उत्पादन हुआ है । इन सब्जियों का उपयोग लोगों ने
अपने भोजन में किया और आपस में सब्जियों का आदान-प्रदान भी किया। जब महिला समूह के द्वारा स्कूल की नियमित निगरानी की जा रही थी, तब आपस में चर्चा कर तय किया गया कि हमारे घरों की तरह स्कूल में भी हरी एवं ताजी सब्जियां खाने में शामिल होने लगे तो बच्चों के पोषण में अंतर आयेगा । क्योंकि तब स्कूल में जो सब्जी आती थी वह बाजार से आती थी। महिलाओं ने स्कूल मेँ पोषण वाटिका लगायी, साथ ही उन्होंने निरंतर निदाई गुड़ाई और देख-रेख की जिम्मेदारी भी ली। अब प्रति दिन बच्चों को स्कूल में लगी पोषण वाटिका से सब्जियां प्राप्त हो रही हैं।
सहभागी सीख एवं कार्रवाई (पीएलए) पद्धति
सहभागी पद्धति से गाँव की समस्याओं की पहचान कर एवं उनके निदान के प्रयत्न किए गए हैं। गाँव में 8 बैठकों का आयोजन किया गया। प्रत्येक बैठक में औसतन 18 महिलाओं द्वारा भागीदारी की गई है। इस प्रक्रिया से महिलाओं में विश्लेषण करने, अपने सामने आने वाली बाधाओं एवं चुनौतियों का सामना करने की ताकत बढ़ी है । इन बैठकों के माध्यम से गाँव में पानी की समस्या, आंगनवाड़ी केंद्र से पोषण आहार (टीएचआर) प्राप्त करने एवं उसके उपयोग, बच्चों की देखभाल एवं टीकाकरण लगवाने, एनएनसी एवं पीएनसी जांच तथा महिलाओं के प्रधान मंत्री मातृ वन्दना योजना से जुड़ी समस्याओं का समाधान निकाला गया, समुदाय में पोषण व्यवहारों को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया तथा प्रधान मंत्री मातृ वन्दना योजना की पात्र महिलाओं को समय से किश्त दिलाने में मदद की गयी.
दस्तक महिला समूह का आजीविका मिशन से जुड़ाव एवं मशरूम उत्पादन
दस्तक महिला समूह के साथ निरंतर सूचना का आदान-प्रदान और निगरानी व्यवस्था के साथ-साथ आजीविका के नए विकल्पों का सृजन भी किया जा रहा है। दस्तक महिला समूह का पंजीयन आजीविका मिशन में कराया गया है और आजीविका मिशन से महिलाओं को मशरूम उत्पादन हेतु प्रक्रिया चलाई गई । गाँव की 12 महिलाओं ने मशरूम अपने घरों में लगाए। इस प्रक्रिया में जिला प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। महिलाओं द्वारा यह पहल प्रति वर्ष ठंड के मौसम में की जाती है। वर्ष 2021 में महिलाओं द्वारा 2 माह में लगभग 40 दिन मशरूम अपने भोजन में शामिल किया और आजीविका के लिए प्रति महिला को 1000 रुपयों की आमदनी हुई।
पारंपरिक खाद्य पदार्थों को पुनः चलन में लाया गया
बाल एवं युवा समूह की बैठकों में जैव विविधता एवं स्थानीय खाद्य संसाधनों पर संवाद किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में गाँव स्तर पर मिलने वाली फसलों, भाजी (चौलाई,नोरपा, कन्कुआ, चेंच), जंगल से मिलने वाली भाजी (फांग, क्योलार, बिरान), जंगली कंद (अंगीठा, सुरन, बिरान कंद), धवा, छेवला, सलैया, गूंजा, कारी, फिपल, बरा, बेरी, कटाई, घोंट, सेजवा एवं जीव-जंतु आदि के बारे में जानकारी इकठ्ठा की गई। 65 प्रकार के स्थानीय पौधों, 22 प्रकार की जड़ी-बूटी, 15 जंगली जानवरों, 32 पक्षियों, 12 प्रकार की स्थानीय एवं जंगली भाजियों के नाम के साथ - साथ 52 पारंपरिक व्यंजनों के नाम जैव विविधता पंजी में दर्ज किये गए। साथ ही समुदाय में यह संवाद भी हुआ कि हम इसे कैसे संरक्षित करेंगे.
लुप्त हो रहे पारम्परिक व्यंजनों को बढ़ावा
दस्तक परियोजना के अंतर्गत ग्राम रानीपुर में युवा समूह के 12 एवं बाल समूह के 13 सदस्यों द्वारा अन्य साथियों के साथ मिलकर लुप्त हो रहे पारंपरिक व्यंजनो को लिखा गया एवं जिला स्तरीय खाद्य मेले में प्रस्तुत किया गया. गाँव के बुजुर्ग महैया कोंदर (उम्र 79 साल) से चर्चा की गई और पुराने पारंपरिक खाद्य पदार्थों एवं लगने वाली सामग्री के बारे में जानकारी जुटाई गई। समुदाय में जागरूकता के लिए घरों में जाकर महिलाओं को पारंपरिक भोजन जैसे दुभरी, महेरी, बरा, मगोरा आदि की जानकारी दी गई। गाँव में महिलाओं की रूचि और लगन से महिलाओं ने पारंपरिक तत्वों को अपने भोजन में शामिल करना शुरू किया। 24 प्रकार के वे व्यंजन जो पहले प्रचलन में रहे हैं उन्हें फिर से समुदाय में चलन में लाया गया।
जल संरचनाओं का निर्माण एवं सुधार
समुदाय की मदद से तालाब का गहरीकरण का कार्य किया गया और गाँव के 43 लोगों ने 3-3 दिन का तालाब गहरीकरण में श्रमदान किया और तालाब के सौन्दर्यीकरण हेतु 100 वृक्षों का रोपण कर सुरक्षा हेतु जाली लगाई गई । गांव के छोटे नाले पर चेक डैम का निर्माण सामुदायिक सहमति से किया गया। तालाब गहरीकरण से गाँव के एवं तालाब के आसपास के कूपों का जलस्तर बढ़ा है और सिंचाई बढ़ी है. गाँव की लगभग 160 एकड़ कृषि भूमि सिंचित हुई है और दो
फसली हुई है। साथ ही पेड़-पौधों एवं जीव-जंतुओं के लिए पानी मिल रहा है।
गांव के विकास की कहानी समुदाय की जुबानी
गाँव वाले बच्चों को अपने साथ पलायन पर ले जाते थे, लेकिन संस्था के प्रयास से मुर्गी पालन, पोषण वाटिका और खेती के कामों से जोड़ा गया, तो बच्चों, किशोरियों,
महिलाओं के स्वास्थ्य में बदलाव आया है और गाँव में कोई भी बच्चा अति कम वजन का नहीं है। -नीलम शर्मा (आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, रानीपुर) गाँव में जल की व्यवस्था को बेहतर बनी है जिससे गाँव वालों की कृषि सिंचित हुई है और गाँव वाले खेती कर रहे हैं । हमने देखा कि गाँव में गठित महिला समूह स्कूल एवं आँगनवाड़ी की निगरानी करते हैं, जिससे शिक्षा के स्तर में भी बदलाव आये हैं। गाँव के 99 प्रतिशत बच्चे स्कूल में दर्ज हैं। - बेटी बाई ( पंचायत सरपंच) पहले गाँव में रोजगार और पानी की समस्या थी जिसे लेकर दस्तक महिला समूह ने काम किया तो सबका विश्वास मजबूत हुआ। महिला समूह ने ग्रामीणों के साथ मिलकर मशरूम व मुर्गी पालन का काम किया साथ ही तालाब एवं चेकडैम के निर्माण में भी श्रमदान किया। इससे पानी को लेकर जातिगत भेदभाव भी दूर हुए। महिला समूह ने मध्यप्रदेश सरकार के मंत्री को पत्र देकर हैंड पंप का निर्माण कराया। -सोमवती कोंदर (महिला समूह अध्यक्ष, रानीपुर) रानीपुर गांव में दस्तक परियोजना के तहत चेकडैम निर्माण, तालाब गहरीकरण तथा वृक्षारोपण का कार्य किया गया है साथ ही मुर्गी पालन एवं मशरूम की खेती हेतु महिलाओं को प्रशिक्षित कर खाद्य सुरक्षा से जोड़ा गया है। इस प्रयास से गांव में सिंचाई बढ़ी है एवं फसल अच्छी हो रही है । - अरविंद मिश्रा, सचिव, ग्राम पंचायत कल्याणपुर
मुख्य बदलाव
सरकार, समुदाय एवं संस्थागत प्रयासों से गाँव में लोगों के भोजन में विविधता आई एवं लोग खाद्य असुरक्षा की स्थिति से बाहर निकल सके। वर्तमान में गंभीर रूप से खाद्य असुरक्षा में कोई परिवार नहीं है। अब कोई गर्भवती महिला उच्च जोखिम में नहीं है।
- गांव में 5 साल तक की उम्र का कोई और कोई बच्चा गंभीर रूप से कुपोषित नहीं है।
- पिछले 3 सालों में गांव में किसी बच्चे की मृत्यु कुपोषण से नहीं हुई है.
- गांव में 28 मध्यम कुपोषित बच्चे थे जो कम होकर अब केवल 2 बच्चे मध्यम कुपोषित रह गए हैं,
- गांव में 18 किशोरी बालिकाएं एनीमिक थीं, जो अब 4 रह गयी हैं ।
